Wednesday, 2 November 2016

हिंदू हो या मुसलमान, शरणार्थियों की खैर नहीं। मजहबी दंगाई सियासत के लिए नागरिकता ब्रह्मास्त्र! विभाजनपीड़ित हिंदुओं को बलि का बकरा बनाकर 2003 का नागरिकता संशोधन विधेयक दरअसल भारत के मुसलमानों की नागरिकता छीनने की सर्वदलीय हिंदुत्व राजनीति है।पहले नागरिकता छीनो,फिर गैरमुसलमानों को नागरिकता दे दो,लेकिन मुसलमानों को नागरिकता कतई मत दो। सेना को समर्थन का मतलब,अबाध पूंजी के लिए युद्ध गृहयुद्ध के कारोबार और नागरिकों के कत्लेआम को समर्थन! पलाश विश्वास

हिंदू हो या मुसलमान, शरणार्थियों की खैर नहीं।
मजहबी दंगाई सियासत के लिए नागरिकता ब्रह्मास्त्र!
विभाजनपीड़ित हिंदुओं को बलि का बकरा बनाकर 2003 का नागरिकता संशोधन विधेयक दरअसल भारत के मुसलमानों की नागरिकता छीनने की सर्वदलीय हिंदुत्व राजनीति है।पहले नागरिकता छीनो,फिर गैरमुसलमानों  को नागरिकता दे दो,लेकिन मुसलमानों को नागरिकता कतई मत दो।
सेना को समर्थन का मतलब,अबाध पूंजी के लिए युद्ध गृहयुद्ध के कारोबार और नागरिकों के कत्लेआम को समर्थन!
पलाश विश्वास
विभाजनपीड़ित हिंदुओं को बलि का बकरा बनाकर 2003 का नागरिकता संशोधन विधेयक दरअसल भारत के मुसलमानों की नागरिकता छीनने की सर्वदलीय हिंदुत्व राजनीति है।पहले नागरिकता छीनो,फिर गैरमुसलमानों को नागरिकता दे दो,लेकिन मुसलमानों को नागरिकता कतई मत दो।यह सीधे तौरपर पूर्वी बंगाल के  हिंदू विभाजनपीड़ितों को नागरिकता से वंचित रखने का स्थाई जमींदारी बंदोबस्त है।
हम खुद पूर्वी बंगाल के विभाजनपीड़ित शरणार्थी परिवार से हैं,जिनकी नागरिकता,आरकक्षण और मातृभाषा के अधिकार के लिए मेरे पिता आजीवन आखिरी सांस तक लड़ते रहे हैं।हम हर हाल में देश भर में जारी नागरिकता के लिए शरणार्थी आंदोलन के साथ हैं।लेकिन सारी राजनीति शरणार्थियों के खिलाफ है जो शरणार्थियों को शतरंज का मोहरा बनाने के बाद हिंदुत्व की पैदल सेना बनाने पर आमादा है।यह मारे लिए निजी तौर पर बहुत बड़ा संकट है।
हम शरणार्थियों की बिना शर्त नागरिकता देने की मांग करते रहे हैं।जैसे पश्चिम पाकिस्तान के शरणार्थियों को नागरिकता मिली है,वैसे ही।
हम 2003 के नागरिकता संशोधन कानून को सिरे से रद्द करने की मांग इसीलिए करते हैं क्योंकि इसका मकसद मुसलमानों को नागरिकता से वंचित करने और हिंदू बंगाली शरणार्थियों की नागरिकता का मसला हिंदू मुसलमान विवाद से नत्थी करने का उपक्रम है जिसके तहत न मुसलमानों को नागरिकता मिलनी है और न हिंदू विभाजनपीड़ितों को।
दोनों पक्ष इस साजिश को समझ लें तो बेहतर है।हमारे पुरखे इस साजिस को समझ नही पराये तो हम भारत पाकिस्तान विवाद से निकल नहीं पा रहे हैॆं और इस साजिश के तहत देश के चप्पे चप्पे पर पाकिस्तान बना रहा है दंगाई राजनीति।यह अनवरत युद्ध है।अनंत गृहयुद्ध है।बेलगाम आत्मध्वंस है।खून की नदियां हैं।इस हिसा की कोई सीमा नहीं है।सीमाओं के आर पार लहू का सैलाब है।आइलान की लाशें हैं।आगजनी,हिसां,कत्लेआम और बलात्कार कार्निवाल नतीजे हैं।
2003 के इस काला शैतानी कानून की पेचदगी किसी संशोधन से खत्म नहीं होती है,इसलिए 1955 के नागरिकता कानून को बहाल करके सबसे पहले विभाजन पीड़ितों को नागरिकता देना जरुरी है।1971 के बाद जो लोग आये हैं,उनकी नागरिकता का मसला भी 1955 के कानून के तहत संभव है,उस कानून में संशोधन के जरिये हिंदू मुसलमान विवाद से हिंदू विभाजनपीड़ितों की समस्या सुलझेगी नहीं।
इसके उलट भारत विभाजन का इतिहास हूबहू दोहराया जा रहा है।
बंगाल में दो राष्ट्र के सिद्धांत के तहत हिंजदुस्तान पाकिस्तान बनाने की राजनीति फिर उसी मजहबू सियासत के जरिये नागरिकता के सवाल पर हिंदुओं और मुसलमानों में बंगाल,त्रिपुरा और असम में सीधे टकराव के हालात बना रही है।
इसके विपरीत पश्चिम पाकिस्तान से आये विभाजनपीड़ितों की नागरिकता के बारे में कोई विवाद नहीं रहा है।उन्हें बिना शर्त नागरिकता दी गयी तो पूर्वी बंगाल के शरणार्थियों की नागरिकता 2003 के कानून के जरिये छिनी क्यों गयी और जब फिर हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता देने का दावा है तब क्यों मुसलमानों को नागरिकता का सवाल बीच में क्यों खड़ा कर दिया जा रहा है।यह चुनावी समीकरण समझना जरुरी है।
जाहिर है कि बंगाल और असम में धार्मिक ध्रूवीकरण से पूरे देश का केसरियाकरण और हिंदू राष्ट्र का आरएसएस के एजंडा को पूरा करने की यह सर्वदलीय राजनीति है और महिलाओं को संसद और विधानसभा में आरक्षण हर कीमत पर रोकने की तर्ज पर यह पूर्वी बंगाल के शरणार्थियों की नागरिकता छीन लेने की सर्वदलीय राजनीति है।असम और बंगाल में दंगे हुए तो दूसरे राज्यों से आये इन राज्यों में बसे लोगों को भी इस दंगे की आग से बचाना मुश्किल होगा।जिसका असर देश विदेश में भारी पैमाने पर होना है।राजनीति सिर्फ यूपी जीतने की सोच रही है।बाकी देश दुनिया की उसे कोई परवाह नहीं है और न इंसानियत और न मजहब से उसका कोई नाता है।
आज इंडियन एक्सप्रेस की सबसे बड़ी खबर नागरिकाता संशोधन विधेयक के सिलसिले में हिंदू और मुसलमान शरणार्थियों में कौन असल दुश्मन है,इसपर असम सरकार के एक खास मंत्री हिमंत विश्व शर्मा का यह जिहादी बेमिसाल बयान है।जो भोपाल में फर्जी मुठभेड़ से ज्यादा खतरनाक है।यहां लाशों की गिनती भी असंभव है।
असम में प्रस्‍तावित नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 का विरोध जारी है। इस विधेयक में बांग्‍लादेश, पाकिस्‍तान और अफगानिस्‍तान से आने वाले अल्‍पसंख्‍यक समुदाय के लोगों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान है। विदेशी नागरिकों को नागरिकता देने के मुद्दे पर पूर्वोत्तर राज्य असम की राजनीति में उबाल आ गया है। केंद्र की भाजपा सरकार ने जुलाई में नागरिकता अधिनियम, 1955 के कुछ प्रावधानों में संशोधन के लिए विधेयक पेश किया था।असम में भी भाजपा की सरकार है।
कृपया गृहयुद्ध के आवाहन की इस युद्ध घोषणा पर गौर करें।भाजपा के नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रैटिक एलाएंस के संयोजक हेमंत विश्व शर्मा ने राज्य के लोगों से कहा है कि अपना दुश्मन चुन लीजिए, या तो 1.5 लाख या 55 लाख लोग।
हेमंत प्रदेश में सरकार में बेहद प्रभावशाली  मंत्री भी हैं। अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में शर्मा के इन बयानों को लिखा है। आंकड़ों पर सफाई नहीं दी हालांकि हेमंत ने इन आंकड़ों को धर्म विशेष से नहीं जोड़ा है, लेकिन उन्होंने यहा जवाब उस समय दिया जब वह विपक्ष के असम की नागरिकता विधेयक पर जवाब दे रहे थे।उन्‍होंने बिल का विरोध करने वालों से पूछा कि किस समुदाय ने असमिया लोगों को अल्‍पसंख्‍यक बनाने की धमकी दी है।
नागरिकता (संसोधन) बिल के जरिए पाकिस्‍तान और बांग्‍लादेश में जुल्‍म सह रहे हिंदुओं, बौद्धों, जैन, सिख और पारसियों को नागरिकता देने का प्रस्‍ताव है। हिंदू और मुसलमान माइग्रेंट में भेद करने की नीति क्‍या भाजपा की है, इस सवाल शर्मा ने कहा, ”हां, हम करते हैं। साफतौर पर हम करते हैं। देश का बंटवारा धर्म के नाम पर हुआ था। इसलिए यह नई चीज नहीं है। जब हम डिब्रूगढ़ या तिनसुखिया जाते हैं तो हमें अच्‍छा लगता है क्‍योंकि वहां पर बहुसंख्‍या में हैं। लेकिन जब आप धुबड़ी या बारपेटा जाते हैं,तब आपको ऐसा नहीं लगता।

Choose your enemy, Hindu or Muslim migrants: Assam BJP minister Himanta Biswa Sarma

Sarma seemed to be referring to Hindu and Muslim migrants as he was replying to queries on the opposition to the Citizenship (Amendment) Bill in Assam.

TATING THAT it is his party’s policy to differentiate between Hindu and Muslim migrants, Assam Minister and convenor of the BJP’s North East Democratic Alliance (NEDA) Himanta Biswa Sarma on Tuesday asked the people of the state to choose their enemy — “the 1-1.5 lakh people or the 55 lakh people?”
Although there are no official figures of Hindu or Muslim migrants from Bangladesh in Assam, political groups often claim that the state has about 55 lakh Bangladeshi migrants. The reference to “1-1.5 lakh” people, however, does not match any known figure.
“The whole thing is that we have to decide who our enemy is. Who is our enemy, the 1-1.5 lakh people or the 55 lakh people? The Assamese community is at the crossroads. We could not (save) 11 districts. If we continue to remain this way, six more districts will go out (of our hands) in the 2021 Census. In 2031, more (districts) will go out,” said Sarma, pressing for the Bill.
While Sarma referred to “11 districts”, the 2011 Census identified nine districts as areas with Muslim majority, up from six in 2001.
साभारः इंडियन एक्सप्रेस
इस सरकारी अल्फाई बयान से असम के अलावा बाकी भारत पर भी अल्फाई राजकाज का असर समझा जा सकता है।सीधे तौर पर मुसलमानों को निशाना बांधकर चांदमारी का मामला कश्मीर घाटी में जो चल रहा है,जैसे यूपी और बाकी भारत में फर्जी मुठभेडो़ं का खेल है,आदिवासियों के खिलाफ सैन्य अभियान है और उसे बहुसंख्य जनता का अंध समर्थन है,ऐसे मुश्किल हालात में करीब दस करोड़ विभाजनपीड़ितों की नागरिकता छीनने की बेशर्म जिहाद का असल मकसद मुसलमानों की चांदमारी है और उन विभाजनपीड़ितों के नागरिक और मानवाधिकार का निषेध है,यह समझना पीड़ितों और शरणार्थियों दोनों के लिए समझना मुश्किल है।
फिलहाल यूपी का कुरुक्षेत्र लड़ने के लिए संघ परिवार का यह जिहाद अनिवार्य है,यह बात तो समझ में आती है।लेकिन वामदलों,तृणमूल कांग्रेस और कांग्राेस की धर्मनिरपेक्षता का अस मकसद क्या है,यह समझ से परे है।
बहरहाल विभाजन के बाद अब भी दुनिया की सबसे बड़ी मुसलमान आबादी भारत में है।कश्मीर में मुसलमानों का बहुमत है और असम,यूपी,बिहार,महाराष्ट्र,बंगाल जैसे अनेक राज्यों में मुसलमानों के समर्थन के बिना कोई सरकार नहीं बन सकती।
ऐसे हालात में मजहबी सियासत की इस खतरनाक चाल से देश के भीतर असंख्य पाकिस्तान बनाने का यह उपक्रम है।जिसका नजारा असम और बंगाल में साफ साफ दीख रहा है।
भारत में हजरत बल संकट,गुजरात नरसंहार और बाबरी विध्वंस का खामियाजा बांग्लादेश और दुनियाभर के हिंदुओं को भुगतना पड़ा है।
बांग्लादेश में अब भी दो करोड़ हिंदू हैं,जिनपर लगातार हमले होते जा रहे हैं।हाल में ये हमले बहुत तेज हो गये है।अबी एक फेसबुक पोस्ट को लेकर बांग्लादेश में हिंदुओं पर जगह जगह हमले हो रहे हैं।
असम और बंगाल में धार्मिक ध्रूवीकरण की राजनीति का क्या असर होना है,यह समझने वाली बात है जबकि असम में राजकाज अल्फाई है।
दूसरी ओर,बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार विभाजनपीडितों को नागरिकता देने के खिलाफ हैं।मुसलमान वोट बैंक वामदलों से छीनकर वे मुख्यमंत्री बनी हैं।बागाल में दुर्गोत्सव से पहले लगभग हर जिले में हालात दंगाई थे।
अब भी बंगाल के हर जिले में हिंदू मुसलमान टकराव की राजनीति चल रही है और वामदलों को हाशिये पर रखकर भाजपा और तृणमूल कांग्रेस खुलकर वोटबैंक की यह राजनीति कर रही हैं।वामदलों की राजनीति मुसलमान वोट बैंक छीने की राजनीति है और विभाजन पीड़ित हिंदू शरणार्थियों के लिए मरीचझांपी नरसंहार है।
2003 के नागरिकता संशोधन कानून का बंगाल के किसी राजनेता ने विरोध नहीं किया था।उस वक्त वामदलों का शासन था।संसदीय समिति के अध्यक्ष कांग्रेस के प्रणव मुखर्जी थे।पूर्वी बंगाल के विभाजनपीड़ितों की तब किसी ने परवाह नहीं की।अब मुसलमानों को नागरिकता देने की मांग करते हुए तृणमूल कांग्रेस,कांग्रेस और वामदल नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध कर रही हैं।जाहिर है कि केंद्र और असम सरकार के ताजा बयान का लक्ष्य सिर्फ असम नहीं है।वे बंगाल में और बाकी देश में भी हिंदू विभाजनपीड़ितों के एकमात्र तरणहार खुद को साबित करने लगे हैं।
मुसलमान वोटबैंक हर कीमत पर दखल में रखने की होड़ में शामिल कांग्रेस,तृणमूल कांग्रेस और वामदलों की राजनीति के मुकाबले संघ परिवार का यह तुरुप का पत्ता है ,जिसके तहत सीधे मुसलमानों को दुश्मन करार दिया जा रहा है।जबकि बंगाल का कोई रोजनीतिक दल विभाजनपीड़ित हिंदू शरणार्थियों के पक्ष में नहीं है।हिंदुओं का पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में ध्रूवीकरण का यह संघ परिवार का अभूतपूर्व मौका है।जिसे बाकी दल जानबूझकर अंजाम तक पहुंचा रहे हैं।
बांग्लादेश में बंगाल और असम और बाकी भारत में मुसलमानविरोधी इस मजहबी सियासत का वहां के दो करोड़ हिंदुओं पर क्या असर होगा या लगातार हमलों की वजह से वे बांग्लादेस में रह सकेंगे या नहीं,इसे लेकर किसी राजनीतिक पक्ष को कोई सरदर्द नहीं है और उनकी मजहबी सियासत का अंतिम लक्ष्य सत्ता है।
बहरहाल,बंगाल में नौ करोड की आबादी में अगर सात करोड़ बंगाली हैं तो चार करोड़ लोग पूर्वी बंगाल से आये शरणार्थी हैं।बंगाल सरकार में उनका कोई मंत्री नहीं है।वाम जमाने में जो भूमि सुधार मंत्रालय रहा है,ममता बनर्जी भूमि आंदोलन की नेता बतौर सत्ता में दोबारा आने के बाद उसे खत्म कर रही हैं।अब भूमि सुधार निषेध है।
1971 में इंदिरा मुजीब समझौते के तहत बांग्लादेश से आने वाले शरणार्थियों का पंजीकरण बंद होने के साथ साथ इंदिरा गांधी ने केंद्र सरकार का पुनर्वास मंत्रालय बंद कर दिया है लेकिन तब से लेकर अब तक सीमापार से आनेवाले शरणार्थियों की तुलना में भारत में जल जंगल जमीन से बेदखल विस्थापितों की संख्या कई गुणा ज्यादा है,जिनके पुनर्वास का कोई बंदोबस्त नहीं है।
बंगाल में लेकिन पुनर्वास मंत्रालय अभीतक है,जिसे अब ममता बनर्जी खत्म कर रही हैं।चुस्त प्रशासनके नाम पर ममता बनर्जी अनुसूचितों के मंत्रालय पर ताला लगाने की तैयारी कर रही हैं।ये सारे कदम शरणार्थियों और अनुसूचितों के खिलाफ हैं।
ऐसे में शरणार्थियों के केसरियाकरण का असर कितना व्यापक होगा,इसका अदाजा लगा लीजिये।मजहबी सियासत के लिए नागरिकता कानून ब्रह्मास्त्र बन गया है जिसके बलि 2003 से अबतक हिंदू शरणार्थी होते रहे हैं और अब सुरासुर संग्राम है और असुरों का सफाया तय है तो समझ लीजिये कि हिंदू हो या मुसलमान,शरणार्थियों की खैर नहीं।क्योकि सत्तापक्ष दोनों के खिलाफ दोनों में दंगे कराने की तैयारी में है।
इसके तहत संघ परिवार विभाजनपीड़ितों का एकमुश्त हिंदुत्वकरण कर रही है तो असम और बंगाल समेत पूरे पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत में गुजरात और खस्मीर जैसे हालात पैदा करके सत्ता पर अपना वर्चस्व कायम करने की कोशिश कर रही है।  नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 के जरिये विभाजनपीड़ितों की 2003 के कानून के तहत छिनी नागरिकता वापस करने का जो उपक्रम है,उसमें भारत में बाहर से आने वाले गैरमुसलिम शरणार्थियों को नागरिकता देने के प्रावधान है जो संवैधानिक ढांचे के मुताबिक समानता के मौलिक अधिकार के खिलाफ है तो अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ भी है।
संघ परिवार ने इस रणनीति के तहत इस विधेयक के खिलाफ वामदलों,तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस समेत धर्मनिरपेक्ष दलों को लामबंद कर दिया है तो संघ परिवार के दावे के मुताबिक राज्यसभा में बहुमत न होने की वजह से इस विधेयक के पारित होने की संभावना बहुत कम है।दूसरी तरफ लोकसभा में बहुमत और राज्यसभा में जोड़ तोड़ के तहत यहकानून पास हो गया तो इसकी तकनीकी खामियों की वजह से इसे लागू करना बहुत मुश्किल है।
राष्ट्र का सैन्यीकरण देश को विदेशी पूंजी के हवाले करने के लिए अनिवार्य है।ताकि अर्थव्यवस्था और उत्पादन प्रणाली,जल जगंल जमीन आजीविका रोजगार नागरिक मानवाधिकार और पर्यावरण से बेदखली के खिलाफ कोई प्रतिरोध न हो।
इसीलिए माहौल यह बनाया गया है कि सिर्फ सैनिकों को हम शहीद मानने लगे हैं और नागरिकों की शहादत हमारे लिए बेमतलब है।सेना को हम तीज त्योहारों के सात जोड़कर धर्मोन्मादी युद्धोन्माद का कार्निवाल मना रहे हैं।
औद्योगीकरण और शहरीकरण के मार्फत अंधाधुंध अबाध विदेशी पूंजी की घुसपैठ से किसानों की थोक आत्महत्या के बाद खुदरा बाजार बेदखल है और विदेशी पूंजी के मुकाबले उद्योग और कारोबार जगत में देशी कंपनियां हिंदुस्तानी बाजार से बेदखल हो रही है।टाटा संस के विवाद में डोकोमो का किस्सा भी नैनो से नत्थी है।जिससे टाटा समूह का बेड़ा गर्क हुआ है।इनी गिनी दो चार कंपनियों को छोड़ दें,तो बाकी भारतीय कंपरनियों की टाटा जैसी दुर्गति तय है।
जाहिर है कि शहादत का सिलसिला सीमाओं पर ही नहीं,खेतों खलिहानों पर ही नहीं,उद्योग और कारोबार के हर सेक्टर में शुरु हो गया है।
इसके बावजूद राजनीतिक नेतृत्व जो अंध राष्ट्रवाद का आवाहन करके निरंकुश पितृसत्ता के फासिज्म के तहत मजहबी सियासत के तहत सेना का राजनीतिकरण पर आमादा है और सेना के साथ खड़े होने की भावुक अपीलें जारी कर रहा है,उसका सीधा मतलब है कि सेना को नहीं,बल्कि हम उनके युद्ध और गृहयुद्ध के कारोबार का समर्थन करें।यह कुल मिलाकर अमेरिका का राष्ट्रपति बनने के प्रबल दावेदार डोनाल्ड ट्रंप की ही राजनीति का ग्लोबीकरण है,जो इजराइल का मुसलमानों के खिलाफ जिहाद है।हम अमेरिका और इजराइल के पार्टनर हैं तो हमारी राजनीति भी अमेरिका और इजराइल की राजनीति है।राजनय का अंजाम भी वही है।जो युद्ध सीरिया के बहाने तीसरा विश्वयुद्ध में तब्दील होने जा रहा है,हम भारत को उसी युद्ध में जानबूझकर शामिल कर रहे हैं तो तीसरे विश्वयुद्ध के महाविनाश के हिस्सेदार बी होंगे हम।मुसलमानों के खिलाफ खुला जिहाद भारत में अरब वसंत का अबाध प्रवाह बन चुका है।
याद करें कि हम पहले ही लिख चुके हैं कि हम यह भी नहीं देख रहे हैं कि अमेरिका परमाणु युद्ध की तैयारी में है और भारत उनके लिए सिर्फ बाजार है।इस बाजार पर कब्जे के लिए वह कुछ भी करेगा।
जाहिर है कि हम यह देख नहीं रहे हैं कि दो दलीय संसदीय तंत्र में जनता के लिए अपना प्रतिनिधि चुनने का कोई विकल्प है ही नहीं।राष्ट्रीय नेतृत्व जो हम चुनते हैं वह देश की एकता ,अखंडता और संप्रभुता की निर्विकल्प समाधि है।अमेरिकी चुनाव में यह बहुत कायदे से साबित हो रहा है।तथाकथित राष्ट्रीय नेतृत्व न राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता है और न जनता का, वह कुलमुिलाकर गुजरात नरसंहार या सिखों के नरसंहार या बाबरी विध्वंस के तहत धार्मिक ध्रूवीकरण का अनचाहा चुनाव नतीजा है।भारत में ऐसा बार बरा होता रहा है और अमेरिका में अबकी दफा यह खुल्ला खेल फर्ऱूखाबादी है।
अरबपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस का समर्थन है और इजराइल का भी समर्थन है।मुसलमानों के खिलाफ जिहाद का ऐलान करने वाले इस धनकुबेर को अमेरिकी मतदाता सिरे से नफरत करते हैं।लेकिन अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बाराक ओबामा की विदेश मंत्री बतौर आइसिस को जन्म देनेवाली हिलेरी के ईमेल से पर्दाफाश हो गया है कि वे अमेरिका के खिलाफ युद्ध कर रही आतंकवादी संस्थाओं को लगातार पैसा और हथियार देती रही हैं।
पिछले 23 अक्तूबर तक बारह प्वाइंट से आगे चल रही हिलेरी अब ट्रंप से एक प्वाइंट पीछे हैं।यानी अमेरिकी जनता हिलेरी को भी राष्ट्रपति पद पर देखना नहीं चाहती।इस बीच कुछ राज्यों में चुनाव पहले से शुरु हो जाने से करीब दो करोड़ वोट पड़ चुके हैं और वहां दोबारा मतदान नहीं हो सकता।
समझा जा सकता है कि इन वोटों से हिलेरी को बढ़त मिली हुई है।अब नतीजा चाहे जो हो,अमेरिकी जनता हिलेरी या ट्रंप में से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर है जबकि दोनों अमेरिकी हितों के खिलाफ हैं।
जाहिर है कि दो दलीय संसदीय प्रणाली लोकतंत्र के लिए ब्लैकहोल की तरह है।हमारे यहां उस तरह दो दलीय लोकतंत्र नहीं है।चुनाव में असंख्य पार्टियां केंद्र और राज्यों में सत्ता संघर्ष में शामिल हैं।लेकिन सही मायने में सत्ता के ध्रूवीकरण को देखें तो हमारे यहां भी दो दलीय संसदीय प्रणाली है।
भारतीय लोकतंत्र में कांग्रेस और भाजपा एक दूसरे के विकल्प हैं।बाकी दल उनके पक्ष विपक्ष में उनके साथ या विरोध में हैं।तीसरा कोई पक्ष भारत में भी नहीं है।वामपक्ष या बहुजन पक्ष या समाजवादी खेमा भाजपा और कांग्रेस के साथ सत्ता में केंद्र या राज्य में साझेदारी तो कर सकता है,लेकिन राजकाज और राष्ट्रीय नेतृत्व फिर कांग्रेस या भाजपा का है,जिनका कोई विकल्प नहीं है।
अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में हम अपना आइना देख सकते हैं कि कैसे राष्ट्रविरोधी ताकतों के हाथों लोकतंत्र का दिवाला निकलता है।

हमने पहले ही लिखा है कि मुश्किल यह है कि हमारी राजनीति जितनी अंध है, उससे कुछ कम हमारी राजनय नहीं है।हम दुनिया को अमेरिकी नजर से देख रहे हैं और हमारी कोई दृष्टि है ही नहीं।हमें अमेरिकी कारपोरेट हितों की ज्यादा चिंता है,भारत या भारतीय जनता के हितों की हमें कोई परवाह नहीं है।

নিখিল ভারত বাঙালি উদ্বাস্ত সমন্বয় সমিতির ডাকে দেশভাগের বলি ছিন্নমূল বাঙালির সাত দশকের অভিশাপ মুক্তির সংগ্রামে দিল্লী চলো ২১-২২ নভেম্বর, ২০১৬, যন্তর মন্তরে ধর্ণা

নিখিল ভারত বাঙালি উদ্বাস্ত সমন্বয় সমিতির ডাকে দেশভাগের বলি ছিন্নমূল বাঙালির সাত দশকের অভিশাপ মুক্তির সংগ্রামে দিল্লী চলো ২১-২২ নভেম্বর, ২০১৬, যন্তর মন্তরে ধর্ণা 
সংগ্রামী সাথী, রাজ্যে রাজ্যে আমাদের তীব্র আন্দোলনের ফলে কেন্দ্রীয় সরকার শেষ পর্যন্ত নাগরিকত্ব আইন সংশোধনের যৌক্তিকতা মেনে নিয়ে ‘সিটিজেনসিপ (এ্যমেণ্ডমেন্ট) বিল, ২০১৬’ সংসদে উথ্থাপন করেছেন। আইনের কয়েকটি দিক নিয়ে কিছু বিতর্ক হওয়ায়, সে বিষয়টি নতুন করে খতিয়ে দেখার জন্য জয়েন্ট পার্লামেন্টারি কমিটির হাতে তুলে দেওয়া হয়েছে।
আমরা গভীর উৎকন্ঠার সঙ্গে লক্ষ করছি, কয়েকটি রাজনৈতিক দলের নেতৃবৃন্দ দেশভাগের বলি ছিন্নমূল উদ্বাস্তদের স্বার্থ ও জীবন-মরণের কথা ভুলে গিয়ে, নীতির প্রশ্ন তুলে বিলটির সর্বাত্মক বিরোধিতায় ব্যস্ত। রাজ্যে রাজ্যে জয়েন্ট কমিটির সদস্য, এমনকি খোদ সভাপতির সঙ্গে দেখা করে আমরা আমাদের বক্তব্য জোরালো ভাবে তুলে ধরেছি।আমরা জানিয়েছি, নতুন করে কাদের নাগরিকত্ব দেওয়া হবে কি হবে না, সেই বিতর্কের ধুয়ো তুলে –যারা দেশভাগের বলি, স্বাধীনতার নামে যাদের স্বাধীনতা কেড়ে মৌলবাদী রাষ্ট্রের ধর্মীয় জিম্মিতে পরিণত করা হয়েছে, প্রাণ ও ইজ্জত রক্ষার দায়ে যারা ভিটে-মাটি ছেড়ে ভারতে আসতে বাধ্য হয়েছেন, তাদের যেন কিছুতেই নাগরিকত্ব থেকে বঞ্চিত করা না হয়।
আশ্চর্যের বিষয় হলো, তেলা মাথায় তেল দিতে সবাই ব্যস্ত।যারা বিপন্ন নয়, যাদের কেউ বিতাড়ন করে নি কোনোদিন, নাগরিকত্ব দাও বলে যারা দাবিও তোলেনি, তাদের নাগরিকত্ব দেওয়া হোক বলে অনেকে চীৎকার করে গলায় রক্ত তুলে ফেলেছেন। কিন্তু, সত্তর বছর ধরে যারা দেশ হারিয়ে পথে-ঘাটে ঠাঁই নিয়েছেন, পুনর্বাসন পান নি, পেলেও জমির পাট্টা পান নি, পান নি জাতিপত্র, মাতৃভাষার অধিকার, আসামে যাদের ঢুকিয়ে দেওয়া হচ্ছে ‘ডিটেনশন ক্যাম্পে’, উত্তরাখণ্ডে এই সেদিনও যাদের ছেলেমেয়েদের স্কুল-কলেজে ভর্তি হতে বাধা দেওয়া হয়েছে বেনাগরিক বলে,-- তাদের জন্যে এঁদের চোখের জল কোনোদিন ঝরতে দেখিনি আমরা। 
ভুলে গেলে চলবে না, আমরা যে দাবি তুলে ধরেছি, তার ভিত্তি হলো স্বাধীনতার সময়কালে দেওয়া জাতীয় নেতৃবৃন্দের প্রতিশ্রুতি।অখণ্ড ভারতের যে অংশকে ভিন্ন রাষ্ট্রে পরিণত করা হয়েছে, সেখানে থাকতে অনিচ্ছুক এবং বিপন্ন সংখ্যালঘুদের ভারতের মাটির উপরে আছে জন্মগত অধিকার।কেউ সেই অধিকার থেকে আমাদের বঞ্চিত করতে পারে না। এই দাবি শুধু রাজ্যে রাজ্যে নয়, তুলতে হবে দিল্লীতে পার্লামেন্টের সামনে গিয়ে।
নাগরিকত্ব আইন নিয়ে এখন চাপান-উতোর চলছে। এ সময় কয়েককোটি মানুষের দাবিকে বাস্তবায়িত করতে হলে বিপুল সংখ্যায় রাজধানীর বুকে প্লাবনের মতো আমাদের আছড়ে পড়তে হবে। আগামী ২১-২২ নভেম্বর, ২০১৬, দিল্লীর যন্তর মন্তরে ধর্ণা-অবস্থানের ডাক দেওয়া হয়েছে। সমস্ত রাজ্য থেকে সংগ্রামী বন্ধুরা আসবেন। তাদের প্রেরণা জোগাতে আসবেন স্বনামধন্য লোককবি অসীম সরকার, গোপাল মহারাজের মতো বিশিষ্টজনেরা। আসুন, সহস্র সহস্র মানুষ সেখানে জমায়েত হয়ে আমরা বজ্রকন্ঠে আওয়াজ তুলি –দেশভাগের বলি ছিন্নমূল মানুষদের নাগরকিত্ব দিতে হবে।ঘটাতে হবে সব বঞ্চনার অবসান। সংগ্রামী অভিনন্দন সহ -- ইতি- 
ডা সুবোধ বিশ্বাস, এ্যাড অম্বিকা রায়
সভাপতি। সাধারন সম্পাদক
কেন্দ্রীয় কমিটি । নিখিল ভারত বাঙালি উদ্বাস্ত সমন্বয় সমিতি

Monday, 31 October 2016

LETTER OF INVITATION TO STAGE DHARNA / RALLY AT JANTAR MANTAR , DELHI ON 21 st 22 nd NOVEMBER, 2016 BY NIKHIL BHARAT

স্তন ছিড়ে ফেলা হয়েছে, যোনিপথে লোহার রড বা বন্দুকের নল ঢুকিয়ে দেওয়া হয়েছে। . ১৯৭১ সনের ২৯শে মার্চ সকাল থেকে আমরা মিটফোর্ড হাসপাতালের লাশঘর ও প্রবেশপথের দুপার্শ্ব থেকে বিশ্ববিদ্যালয় শিববাড়ী, রমনা কালিবাড়ী, রোকেয়া হল, মুসলিম হল, ঢাকা হল থেকে লাশ উঠিয়েছি। ২৯শে মার্চ আমাদের ট্রাক প্রথম ঢাকা মিটফোর্ড হাসপাতালের প্রবেশ পথে যায়। আমরা উক্ত পাঁচজন ডোম হাসপাতালের প্রবেশপথে নেমে একটি বাঙ্গালী যুবকের পচা, ফুলা, বিকৃত লাশ দেখতে পেলাম। লাশ গলে যাওয়ায় লোহার কাঁটার সাথে গেঁথে লাশ ট্রাকে তুলেছি। আমাদের ইন্সপেক্টর আমাদের সাথে ছিলেন। এরপর আমরা লাশ ঘরে প্রবেশ করে বহু যুবক-যুবতী, বৃদ্ধ- কিশোর ও শিশুর স্তুপীকৃত লাশ দেখলাম। আমি এবং বদলু ডোম লাশ ঘর থেকে লাশের পা ধরে টেনে ট্রাকের সামনে জমা করেছি, আর গণেশ, রঞ্জিত(লাল বাহাদুর) এবং কানাই লোহার কাঁটা দিয়ে বিঁধিয়ে বিঁধিয়ে পচা, গলিত লাশ ট্রাকে তুলেছে। প্রতিটি লাশ গুলিতে ঝাঁঝরা দেখিছি, মেয়েদের লাশের কারো স্তন পাই নাই, যোনীপথ ক্ষতবিক্ষত এবং পিছনের মাংস কাটা দেখিছি। মেয়েদের লাশ দেখে মনে হয়েছে, তাদের হত্যা করার পূর্বে তাদের স্তন জোর করে ছিঁড়ে ফেলা হয়েছে, যোনিপথে লোহার রড কিংবা বন্দুকের নল ঢুকিয়ে দেওয়া হয়েছে। যুবতী মেয়েদের যোনিপথের এবং পিছনের মাংস যেন ধারালো চাকু দিয়ে কেটে এসিড দিয়ে জ্বালিয়ে দেয়া হয়েছে। প্রতিটি যুবতী মেয়ের মাথায় খোঁপা খোঁপা চুল দেখলাম। মিটফোর্ড থেকে আমরা প্রতিবারে একশত লাশ নিয়ে ধলপুর ময়লার ডিপোতে ফেলেছি। . চুন্নু ডোমের সাক্ষাৎকার। বাংলাদেশের স্বাধীনতা যুদ্ধঃ দলিলপত্রের অষ্টম খন্ডের (১২-৬৬) সংকলন।

স্তন ছিড়ে ফেলা হয়েছে, যোনিপথে লোহার রড বা বন্দুকের নল ঢুকিয়ে দেওয়া হয়েছে। . ১৯৭১ সনের ২৯শে মার্চ সকাল থেকে আমরা মিটফোর্ড হাসপাতালের লাশঘর ও প্রবেশপথের দুপার্শ্ব থেকে বিশ্ববিদ্যালয় শিববাড়ী, রমনা কালিবাড়ী, রোকেয়া হল, মুসলিম হল, ঢাকা হল থেকে লাশ উঠিয়েছি। ২৯শে মার্চ আমাদের ট্রাক প্রথম ঢাকা মিটফোর্ড হাসপাতালের প্রবেশ পথে যায়। আমরা উক্ত পাঁচজন ডোম হাসপাতালের প্রবেশপথে নেমে একটি বাঙ্গালী যুবকের পচা, ফুলা, বিকৃত লাশ দেখতে পেলাম। লাশ গলে যাওয়ায় লোহার কাঁটার সাথে গেঁথে লাশ ট্রাকে তুলেছি। আমাদের ইন্সপেক্টর আমাদের সাথে ছিলেন। এরপর আমরা লাশ ঘরে প্রবেশ করে বহু যুবক-যুবতী, বৃদ্ধ- কিশোর ও শিশুর স্তুপীকৃত লাশ দেখলাম। আমি এবং বদলু ডোম লাশ ঘর থেকে লাশের পা ধরে টেনে ট্রাকের সামনে জমা করেছি, আর গণেশ, রঞ্জিত(লাল বাহাদুর) এবং কানাই লোহার কাঁটা দিয়ে বিঁধিয়ে বিঁধিয়ে পচা, গলিত লাশ ট্রাকে তুলেছে। প্রতিটি লাশ গুলিতে ঝাঁঝরা দেখিছি, মেয়েদের লাশের কারো স্তন পাই নাই, যোনীপথ ক্ষতবিক্ষত এবং পিছনের মাংস কাটা দেখিছি। মেয়েদের লাশ দেখে মনে হয়েছে, তাদের হত্যা করার পূর্বে তাদের স্তন জোর করে ছিঁড়ে ফেলা হয়েছে, যোনিপথে লোহার রড কিংবা বন্দুকের নল ঢুকিয়ে দেওয়া হয়েছে। যুবতী মেয়েদের যোনিপথের এবং পিছনের মাংস যেন ধারালো চাকু দিয়ে কেটে এসিড দিয়ে জ্বালিয়ে দেয়া হয়েছে। প্রতিটি যুবতী মেয়ের মাথায় খোঁপা খোঁপা চুল দেখলাম। মিটফোর্ড থেকে আমরা প্রতিবারে একশত লাশ নিয়ে ধলপুর ময়লার ডিপোতে ফেলেছি। . চুন্নু ডোমের সাক্ষাৎকার। বাংলাদেশের স্বাধীনতা যুদ্ধঃ দলিলপত্রের অষ্টম খন্ডের (১২-৬৬) সংকলন।

Thursday, 27 October 2016

‎Mrinal Sikder নাগরিকত্ব বিলের বিরোধিতা করল তৃনমুল কংগ্রেস। এর আগে একই রাস্তাতে হেটেছে সিপিএমের সেলিম, কংগ্রেসের তরুন গগৈ। যুক্তি টা কি? এটা সাম্প্রদায়িক বিল। কিন্তু এখন প্রশ্ন হল ভারত ভাগ ভাষা বা ভুগোলের ভিত্তি হয়েছিল কি? না, এটা সম্পুর্ন দ্বিজাতিত্তত্বের ভিত্তিতে হয়েছিল।বাংলাদেশ পাকিস্তানের সংখ্যালঘুরা মুসলিম মৌলবাদের জন্য উদ্বাস্তু হয়েছিল এবং এখনও হচ্ছে। তাই ধর্মীয় নির্যাতনের বলি এই হিন্দু, বৌদ্ধ, খ্রিষ্টান দের নাগরিকত্ব কিভাবে সাম্প্রদায়িক হতে পারে? এখন যেসব মুসলিমরা বাংলাদেশ বা পাকিস্তান থেকে আসছে তারা আসছে ভারত থেকে উপার্জন করে বাংলাদেশে পাঠানোর জন্য নতুবা ভারতের জনবিন্যাসের পরিবর্তনন করে মুসলিম সংখ্যাগরিষ্ঠ পাকিস্তানে পরিনত করতে। বিশ্বের কোন দেশ এইভাবে অবৈধ অনুপ্রবেশকারী দের নাগরিকত্ব দেয় কি? আর মুসলিমদের যদি নাগরিকত্ব দিতে হয় তবে বাংলাদেশ বা পাকস্তানকেও ভারতে সংগে জুড়ে দেওয়া হোক। তাই সকল উদবাস্ত দরদী মানুষের কাছে আবেদন আপনারা ঐক্যবদ্ধ আন্দোলন গড়ে তুলুন, নিজের অধিকারে আদায়ের জন্য সমস্ত ষড়যন্ত্রের বিরুদ্ধে সোচ্চার হন

Mrinal Sikder

নাগরিকত্ব বিলের বিরোধিতা করল তৃনমুল কংগ্রেস। এর আগে একই রাস্তাতে হেটেছে সিপিএমের সেলিম, কংগ্রেসের তরুন গগৈ। যুক্তি টা কি? এটা সাম্প্রদায়িক বিল। কিন্তু এখন প্রশ্ন হল ভারত ভাগ ভাষা বা ভুগোলের ভিত্তি হয়েছিল কি? না, এটা সম্পুর্ন দ্বিজাতিত্তত্বের ভিত্তিতে হয়েছিল।বাংলাদেশ পাকিস্তানের সংখ্যালঘুরা মুসলিম মৌলবাদের জন্য উদ্বাস্তু হয়েছিল এবং এখনও হচ্ছে। তাই ধর্মীয় নির্যাতনের বলি এই হিন্দু, বৌদ্ধ, খ্রিষ্টান দের নাগরিকত্ব কিভাবে সাম্প্রদায়িক হতে পারে? এখন যেসব মুসলিমরা বাংলাদেশ বা পাকিস্তান থেকে আসছে তারা আসছে ভারত থেকে উপার্জন করে বাংলাদেশে পাঠানোর জন্য নতুবা ভারতের জনবিন্যাসের পরিবর্তনন করে মুসলিম সংখ্যাগরিষ্ঠ পাকিস্তানে পরিনত করতে। বিশ্বের কোন দেশ এইভাবে অবৈধ অনুপ্রবেশকারী দের নাগরিকত্ব দেয় কি? আর মুসলিমদের যদি নাগরিকত্ব দিতে হয় তবে বাংলাদেশ বা পাকস্তানকেও ভারতে সংগে জুড়ে দেওয়া হোক। তাই সকল উদবাস্ত দরদী মানুষের কাছে আবেদন আপনারা ঐক্যবদ্ধ আন্দোলন গড়ে তুলুন, নিজের অধিকারে আদায়ের জন্য সমস্ত ষড়যন্ত্রের বিরুদ্ধে সোচ্চার হন

Subodh Biswas বজ্রাঘাত , এ কি শুনতে পেলাম। বাঙালি জাতির দিদি মাননীয়া মুখ্যমন্ত্রী মমতা ব্যানার্জী নাগরিকত্ব বিলের বিরোধিতা করবেন। ।যেসব বাঙালি রাজনীতিক দল উদ্বাস্তুদের ভোটে বিজয়ী হন, তারা কেন মুখে গোদরেজের তালা মেরে আছেন। কোথায় গেল মমতা দিদির প্রতিশ্রুতি ? কোথায় গেলো সর্বহারাদের সি পি এম পার্টী ।কংগ্রেস পার্টী ও কী শ্রবন শক্তি হারালো। অবাঙালি সাংসদরা পার্লামেন্টে নাগরিকত্ব বিলের সমর্থন করছেন, অথচ বাঙালি অনেক সংসদরা বিলের বিরোধিতা করবেন। এরা উদ্স্তু বাঙালিদের বনদ্ধু না শত্রু। আমরা কাদের বিজয়ী করেছি। দুখের বিষয় উদ্বাস্তু সংসদরাও বাকশক্তি হারিয়ে ফেলেছেন। এমন কী ঠাকুর নগরের মাননীয়া মমতা বালা ঠাকুরেও কোন প্রতিকৃয়া পাচ্ছিনা। অভিভাবক হীন ছিন্নমূল জনগোষ্ঠীদের আসল বন্ধু কে বুঝেনেবার সময় এসেগেছে।

Subodh Biswas
বজ্রাঘাত , এ কি শুনতে পেলাম। বাঙালি জাতির দিদি মাননীয়া মুখ্যমন্ত্রী মমতা ব্যানার্জী নাগরিকত্ব বিলের বিরোধিতা করবেন। ।যেসব বাঙালি রাজনীতিক দল উদ্বাস্তুদের ভোটে বিজয়ী হন, তারা কেন মুখে গোদরেজের তালা মেরে আছেন। কোথায় গেল মমতা দিদির প্রতিশ্রুতি ? কোথায় গেলো সর্বহারাদের সি পি এম পার্টী ।কংগ্রেস পার্টী ও কী শ্রবন শক্তি হারালো। অবাঙালি সাংসদরা পার্লামেন্টে নাগরিকত্ব বিলের সমর্থন করছেন, অথচ বাঙালি অনেক সংসদরা বিলের বিরোধিতা করবেন। এরা উদ্স্তু বাঙালিদের বনদ্ধু না শত্রু। আমরা কাদের বিজয়ী করেছি। দুখের বিষয় উদ্বাস্তু সংসদরাও বাকশক্তি হারিয়ে ফেলেছেন। এমন কী ঠাকুর নগরের মাননীয়া মমতা বালা ঠাকুরেও কোন প্রতিকৃয়া পাচ্ছিনা। অভিভাবক হীন ছিন্নমূল জনগোষ্ঠীদের আসল বন্ধু কে বুঝেনেবার সময় এসেগেছে।

शरणार्थियों की नागरिकता के विरोध में ममता बनर्जी और इस विधेयक को लेकर बंगाल और असम में धार्मिक ध्रूवीकरण बेहद तेज शरणार्थियों को नागरिकता का मामला कुछ ऐसा ही बन गया है जैसे महिलाओं को राजनीतिक आरक्षण का मामला है।तकनीकी विरोध के तहत संसद के हर सत्र में महिला सांसदों की एकजुटता के बावजूद उन्हें राजनीतिक आरक्षण सभी दलों की ओर से जैसे रोका जा रहा है,2016 के नागरिकता संशोधन विधेयक के तकनीकी मुद्दों के तहत मुसलमान वोट बैंक को साध लेने की होड़ में विभाजनपीड़ितों की नागरिकता का मामला तो लटक ही गया है और इससे असम और बंगाल में कश्मीर से भी भयंकर हालात पैदा हो रहे हैं।पहले शरणार्थी वामदलों के साथ थे।मरीचझांपी नरसंहार के बाद परिवर्तन काल में शरणार्थी तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में हो गये और शरणार्थियों में देशबर में कहीं भी वामदलों का समर्थन नहीं है।धर्मनिरपेक्ष राजनीति के इस विधेयक के तकनीकी विरोध के साथ शरणार्थी अब पूरे देश में संघ परिवार के खेमे में चले जायेंगे।बंगाल में 2021 में संघ परिवार के राजकाज की तैयारी जोरों पर है। पलाश विश्वास


शरणार्थियों की नागरिकता के विरोध में ममता बनर्जी और इस विधेयक को लेकर बंगाल और असम में धार्मिक ध्रूवीकरण बेहद तेज
शरणार्थियों को नागरिकता का मामला कुछ ऐसा ही बन गया है जैसे महिलाओं को राजनीतिक आरक्षण का मामला है।तकनीकी विरोध के तहत संसद के हर सत्र में महिला सांसदों की एकजुटता के बावजूद उन्हें राजनीतिक आरक्षण सभी दलों की ओर से जैसे रोका जा रहा है,2016 के नागरिकता संशोधन विधेयक के तकनीकी मुद्दों के तहत मुसलमान वोट बैंक को साध लेने की होड़ में विभाजनपीड़ितों की नागरिकता का मामला तो लटक ही गया है और इससे असम और बंगाल में कश्मीर से भी भयंकर हालात पैदा हो रहे हैं।पहले शरणार्थी वामदलों के साथ थे।मरीचझांपी नरसंहार के बाद परिवर्तन काल में शरणार्थी तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में हो गये और शरणार्थियों में देशबर में कहीं भी वामदलों का समर्थन नहीं है।धर्मनिरपेक्ष राजनीति के इस विधेयक के तकनीकी विरोध के साथ शरणार्थी अब पूरे देश में संघ परिवार के खेमे में चले जायेंगे।बंगाल में 2021 में संघ परिवार के राजकाज की तैयारी जोरों पर है।
पलाश विश्वास
Refugees from East Bengal के लिए चित्र परिणाम
सबसे पहले यह साफ साफ कह देना जरुरी है कि हम भारत ही नहीं,दुनियाभर के शरणार्थियों के हकहकू के लिए लामबंद हैं।
सबसे पहले यह साफ साफ कह देना जरुरी है कि हम विभाजनपीड़ित शरणार्थियों की नागरिकता के लिए जारी देशव्यापी आंदोलन के साथ है।
सबसे पहले यह साफ साफ कह देना जरुरी है कि विभाजनपीड़ितों की नागरकता के मसले को लेकर धार्मिक ध्रूवीकरण की दंगाई राजनीति का हम पुरजोर विरोध करते हैं।विभाजनपीड़ितों की पहचान अस्मिताओं या धर्म का मसला नहीं है।यह विशुद्ध तौर पर कानूनी और प्रशासनिक मामला है,जिसे जबर्दस्ती धार्मिक मसला बना दिया गया है और पूरी राजनीति इस धतकरम में शामिल है,जो विभाजनपीड़ितों के खिलाफ है।
कुछ दिनों पहले मैंने लिखा था कि इतने भयंकर हालात हैं कि अमन चैन के लिहाज से उनका खुलासा करना भी संभव नही है।पूरे बंगाल में जिस तरह सांप्रदायिक ध्रूवीकरण होने लगा है,वह गुजरात से कम खतरनाक नहीं है तो असम में भी गैरअसमिया तमाम समुदाओं के लिए जान माल का भारी खतरा पैदा हो गया है। गुजरात अब शांत है।लेकिन बंगाल और असम में भारी उथल पुथल होने लगा है।मैंने लिखा था कि असम और बंगाल में हालात कश्मीर से ज्यादा संगीन है।
पहले मैं इस संवेदनशील मुद्दे पर चुप रहना बेहतर समझ रहा था लेकिन हालात असम में विभाजनपीड़ितों की नागरिकता के खिलाफ अल्फाई आंदोलन  और बंगाल में भी धार्मिक ध्रूवीकरण की वजह से बेहद तेजी से बेलगाम होते जा रहे हैं,इसलिए अंततः इस तरफ आपका ध्यान खींचना अनिवार्य हो गया है।
नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 को लेकर यह ध्रूवीकरण बेहद ते ज हो गया है।हम शुरु से शरणार्थियों के साथ हैं।यह समस्या 2003 के नागरिकता संशोधन विधयक से पैदा हुई है,जो सर्वदलीय सहमति से संसद में पास हुआ।
जन्मजात नागरिकता का प्रावधान खत्म होने से जो पेजदगिया पैंदा हो गयी हैं,उन्हें उस कानून में किसी भी तरह का संशोधन से खत्म करना नामुमकिन है।
1955 के नागरिकता कानून के तहत शरणार्थियों को जो नागरिकता का अधिकार दिया गया था,उसे छीन लेने की वजह से यह समस्या है।
यह कानून भाजपा ने पास कराया था,जिसका समर्थन बाकी दलों ने किया था।बाद में 2005 में डा. मनमोहनसिह की कांग्रेस सरकार ने इस कानून को संसोधित कर लागू कर दिया।गौरतलब है कि मनमोहन सिह और जनरल शंकर राय चौधरी ने ही 2003 के नागरिकता संशोधन विधेयक में शरणार्थियों को नागरिकता का प्रावधान रखने का सुझाव दिया था,लेकिन जब उनकी सरकार ने उस कानून को संशोधित करके लागू किया तो वे शरणार्थियों की नागरिकता का मुद्दा सिरे से भूल गये।
अब वही भाजपा सत्ता में है और वह अपने बनाये उसी कानून में संसोधन करके मुसलमानों को चोड़कर तमाम शरणार्थियों को नागरिकता देने के लिए नागरिकता संशोधन 2016 विधेयक पास कराने की कोशिश में है और उसे शरणार्थी संगठनों का समर्थन हासिल है।लेकिन भाजपा को छोड़कर किोई राजनीतिक दल इस विधेयक के पक्ष में नहीं है।दूसरी ओर,शरणार्थियों की नागरिकता के बजाय संघ परिवार मुसलमानों को नागरिकता के अधिकार से वंचित करने की तैयारी में है।जबकि तृणमूल कांग्रेस और वामपंथी दलों के साथ असम की सरकार के इस विधेयक को समर्थन के बावजूद असम के तमाम राजनीतिक दल और अल्फा,आसु जैसे संगठन इसके प्रबल विरोध में हैं।आसु ने असम में इसके खिलाफ आंदोलन तेज कर दिया है।असम में गैर असमिया समुदायोेें के खिलाफ कभी भी फिर दंगे भड़क सकते हैं।भयंकर दंगे।
राजनीतिक दल इस कानून के तहत मुसलमानों को भी नागरिकता देने की मांग कर रहे हैं जिसके लिए संघ परिवार या एसम के राजनीतिक दल या संगठन तैयार नहीं हैं।असम में तो किसी भी गैरअसमिया के नागरिक और मानवाधिकार को मानने के लिए अल्फा और आसु तैयार नहीं है,भाजपा की सरकार में राजकाज उन्हीं का है।
वामपंथी दलों के साथ तृणमूल कांग्रेस इस विधेयक का शुरु से विरोध करती रही है।अब बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और पश्चिम बंगालसरकार इस विधेयक का आधिकारिक विरोध करते हुए उसे वापस लेने की मांग कर रही है।
शरणार्थियों को नागरिकता का मामला कुछ ऐसा ही बन गया है जैसे महिलाओं को राजनीतिक आरक्षण का मामला है।तकनीकी विरोध के तहत संसद के हर सत्र में महिला सांसदों की एकजुटता के बावजूद उन्हें राजनीतिक आरक्षण सभी दलों की ओर से जैसे रोका जा रहा है,2016 के नागरिकता संशोधन विधेयक के तकनीकी मुद्दों के तहत मुसलमान वोट बैंक को साध लेने की होड़ में विभाजनपीड़ितों की नागरिकता का मामला तो लटक ही गया है और इससे असम और बंगाल में कश्मीर से भी भयंकर हालात पैदा हो रहे हैं।पहले शरणार्थी वामदलों के साथ थे।मरीचझांपी नरसंहार के बाद परिवर्तन काल में शरणार्थी तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में हो गये और शरणार्थियों में देशबर में कहीं भी वामदलों का समर्थन नहीं है।धर्मनिरपेक्ष राजनीति के इस विधेयक के तकनीकी विरोध के साथ शरणार्थी अब पूरे देश में संघ परिवार के खेमे में चले जायेंगे।बंगाल में 2021 में संघ परिवार के राजकाज की तैयारी जोरों पर है।
गौरतलब है कि दंडकारण्य और बाकी भारत से विभाजनपीड़ितों को बंगाल बुलाकर उनके वोटबैंक के सहारे कांग्रेस को बंगाल में सत्ता से बेदखल करने का आंदोलन कामरेड ज्योति बसु और राम चटर्जी के नेतृत्व में वामदलों ने शुरु किया था।मध्यबारत के पांच बड़े शरणार्थी शिविरों को  उन्होंने इस आंदोलन का आधार बनाया था।शरणार्थियों के मामले में बंगल की वामपंथी भूमिका से पहले ही मोहभंग हो जाने की वजह से शरणार्थियों के नेता पुलिनबाबू ने तब इस आंदोलन का पुरजोर विरोध किया था,जिस वजह से वाम असर में सिर्फ दंडकारण्य के शरणार्थी ही वाम आवाहन पर सुंदरवन के मरीचझांपी पहुंचे तब तक कांग्रेस को वोटबैंक तोड़कर मुसलमानों के समर्थन से ज्योति बसु बंगाल के मुख्यमंत्री बन चुके थे और वामदलों के लिए शरणार्थी वोट बैंक की जरुरत खत्म हो चुकी थी।जनवरी 1979 में इसीलिए मरीचझांपी नरसंहार हो गया और बंगाल और बाकी देश में वामपंथियों के खिलाफ हो गये तमाम शरणार्थी।
बहुत संभव है कि लोकसभा में भारी बहुमत और राज्यसभा में जोड़ तोड़ के दम पर संघ परिवार यह कानून पास करा लें लेकिन 1955 के नागरिकता कानून को बहाल किये बिना संशोधनों के साथ 2003 के कानून को लागू करने में कानूनी अड़चनें भी कम नहीं होंगी और इस नये कानून से नागरिकता का मामला सुलझने वाला नहीं है।शरणार्थी समस्या सुलझने के आसार नहीं है लेकिन इस प्रस्तावित नागरिकता संशोधन के विरोध और विभाजनपीड़ितों की नागरिकता के साथ मुसलमान वोट बैंक की राजनीति जुड़ जाने से जो धार्मिक ध्रूवीकरण बेहद तेज हो गया है,उससे बंगाल और असम में पंजाब,गुजरात और कश्मीर से भयानत नतीजे होने का अंदेशा है।
जहां तक हमारा निजी मत है,हम 2003 के नागरिकता संशोदन कानून को सिरे से रद्द करके 1955 के नागरिकता कानून को बहाल करने की मांग करते रहे हैं।1955 के कानून को लेकर कोई विरोध नही रहा है।इसीके मद्देनजर हमने अभी तक इस मुद्दे परकुछ लिखा नहीं है और न ही संसदीय समिति को अपना पक्ष बताया है क्योंकि संसदीय समिति में शामिल सदस्यअपनी अपनी राजनीति कर रहे हैं और सुनवाई सिर्फ इस विधेयक को लेकर राजनीतिक समीकरण साधने का बहाना है।
वे हमारे अपने लोग हैं जिनके लिए मेरे दिवंगत पिता पुलिनबाबू ने तजिंदगी सीमाओं के आर पार सर्वहारा बहुजनों को अंबेडकरी मिशन के तहत एकताबद्ध करने की कोशिश में दौड़ते रहे हैं। जब बंगाल में कम्युनिस्ट नेता बंगाल से बाहर शरणार्थियों के पुनर्वास का पुरजोर विरोध कर रहे थे,तब पुलिनबाबू कम्युनिस्टों के शरणार्थी आंदोलन में बने रहकर शरणार्थियों को बंगाल से बाहर दंडकारण्य या अंडमान में एकसाथ बसाकर उन्हें पूर्वी बंगाल जैसा होमलैंड देने की मांग कर रहे थे।
केवड़ातला महाश्मशान पर इस मांग को लेकर पुलिनबाबू ने आमरण अनशन शुरु किया तो उनका कामरेड ज्योतिबसु समेत तमाम कम्युनिस्ट नेताओं से टकराव हो गया।उन्हें ओड़ीशा उनके साथियों के सात भेज दिया गया लेकिन जब उनका आंदोलन वहां भी जारी रहा तो उन्हें नैनीताल की तराई के जंगल में भेज दिया गया।वहां भी कम्युनिस्ट नेता की हैसियत से उन्होंने ढिमरी ब्लाक किसान आंदोलन का नेतृत्व किया।आंदोलन के सैन्य दमन के बाद तेलंगना के तुरंत बाद कम्युनिस्ट पार्टी ने उस आंदोलन से नाता तोड़ दिया।फिर उन्होंने कम्युनिस्टों पर कभी भरोसा नहीं किया।
वैचारिक वाद विवाद में बिना उलझे पुलिनबाबू हर हाल में शरणार्थियों की नागरिकता,उनके आरक्षण और उनके मातृभाषी के अधिकार के लिए लड़ते रहे।1971 में बांग्लादेश बनने के बाद भी वे ढाका में शरणार्थी समस्या के स्थाई हल के लिए पूर्वी और पश्चिमी बंगाल के एकीकरण की मांग करते हुए जेल गये।
1971 के बाद वीरेंद्र विश्वास ने भी पद्मा नदी के इस पार बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों के लिए होम लैंड आंदोलन शुरु किया था।मरीचझापी आंदोलन में भी वे नरसंहार के शिकार शरणार्थियों के साथ खड़े थे।
तबसे आजतक विभाजनपीड़ित बंगाली शरणाऱ्थियों की नागरिकता,आरक्षण और मातृभाषा के अधिकार को लेकर आंदोलन जारी है लेकिन किसी भी स्तर पर इसकी सुनवाई नहीं हो रही है।सीमापार से लगातार जारी शरणार्थी सैलाब की वजह से दिनोंदिन यह समस्या जटिल होती रही है।भारत सरकार ने बांग्लादेश में अल्पसंक्यक उत्पीड़न रोकने के लिए कोई पहल 1947 से अब तक नही की है।2003 के कानून के बाद सन1947 के विभाजन के तुरंत बाद भारत आ चुके विभाजनपीड़ितों की नागरिकता छीन जाने से यह समस्या बेहद जटिल हो गयी है।1971 से हिंदुओं के साथ बड़े पैमाने पर असम,त्रिपुरा,बिहार और बंगाल में जो बांग्लादेशी मुसलमान आ गये,उसके खिलाफ असम औरत्रिपुरा में हुए खून खराबे के बावजूद इस समस्या को सुलझाने के बजाय राजीतिक दल अपना अपना वोटबैंक मजबूत करने के मकसद से राजनीति करते रहे,शरणार्थी समस्या सुलझाने की कोशिश ही नहीं हुई।
1960 के दशक में बंगाली शरणार्थियों के खिलाफ असम में हुए दंगो के बाद से लगातार पुलिन बाबू शरणार्थियों की नागरिकता की मांग करते रहे लेकिन वे शरणार्थियों का कोई राष्ट्रव्यापी संगठन बना नहीं सके।वे 1960 में असम के दंगाग्रस्त इलाकों में शरणार्तियों के साथ थे।अस्सी के दशक में भी बिना बंगाल के समर्थन के विदेशी हटाओ के बहाने असम से गैर असमिया समुदायों को खदेडने के खिलाफ वे शरणार्थियों की नागरिकता के सवाल को मुख्य मुद्दा मानते रहे हैं।
शरणार्थी समस्या सुलझाने के मकसद से अटल बिहारी वाजपेयी की पहल पर वे 1969 में भारतीय जनसंघ में शामिल भी हुए तो सालभर में उन्हें मालूम हो गया कि संघियों की कोई दिलचस्पी शरणार्थियों को नागरिकता देने में नहीं है।
हमें अनुभवों से अच्छीतरह मालूम है कि शरणार्थियों को बलि का बकरा बनाने की राजनीति की क्या दशा और दिशा है।लेकिन राजनीति यही रही तो हम शरणार्थी आंदोलन के केसरियाकरण को रोकने की स्थिति में कतई नही हैं।जो अंततः बंगाल में केसरियाकरण का एजंडा भी कामयाब बना सकता है।वामपंथी इसे रोक नही सकते।
बाकी राजनीतिक दलों के विभाजनपीड़ितों की नागरिकता के किलाफऱ लामबंद हो जाने के बाद असम और बंगाल में ही नहीं बाकी देश में भी इस मुद्दे पर धार्मिक ध्रूवीकरण का सिलसिला तेज होने का अंदेशा है।
कानूनी और तकनीकी मुद्दों को सुलझाकर तुरंत विभाजनपीड़ितों की नागरिकता देने की सर्वदलीय पहल हो तो यह धार्मिक ध्रूवीकरण रोका जा सकता है।

The Citizenship (Amendment) Bill, 2016

Security / Law / Strategic affairs

The Citizenship (Amendment) Bill, 2016

Highlights of the Bill

  • The Bill amends the Citizenship Act, 1955 to make illegal migrants who are Hindus, Sikhs, Buddhists, Jains, Parsis and Christians from Afghanistan, Bangladesh and Pakistan, eligible for citizenship.
  • Under the Act, one of the requirements for citizenship by naturalisation is that the applicant must have resided in India during the last 12 months, and for 11 of the previous 14 years.  The Bill relaxes this 11 year requirement to six years for persons belonging to the same six religions and three countries.
  • The Bill provides that the registration of Overseas Citizen of India (OCI) cardholders may be cancelled if they violate any law.

Key Issues and Analysis

  • The Bill makes illegal migrants eligible for citizenship on the basis of religion. This may violate Article 14 of the Constitution which guarantees right to equality.
  • The Bill allows cancellation of OCI registration for violation of any law. This is a wide ground that may cover a range of violations, including minor offences (eg. parking in a no parking zone).
http://www.prsindia.org/billtrack/the-citizenship-amendment-bill-2016-4348/